सेराज अहमद कुरैशी
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।
परिकल्पना शोध समस्या का एक संभावित समाधान है। यह एक ऐसा पूर्वानुमान है ,जो दो या दो से अधिक चरों में व्याप्त संबंधों को परिकल्पित करता है। यह शोधकर्ता को शोध कार्य संपादित करने में ना केवल सहायक होता है बल्कि उसे दिशा निर्देश भी देता है। संक्षेप में परिकल्पना शोध कार्य का आधार है।
यह विचार दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर में शिक्षाशास्त्र विभाग के आचार्य प्रोफ़ेसर राजेश कुमार सिंह के हैं। वे चंद्रकांति रमावती देवी आर्य महिला पीजी कॉलेज में एम एड विभाग द्वारा *परिकल्पना का परीक्षण* विषय पर आयोजित एकदिवसीय कार्यशाला में बतौर मुख्य वक्ता प्रतिभागियों को संबोधित कर रहे थे। शोध परिकल्पना एवं शून्य परिकल्पना में अंतर बताते हुए उन्होंने एक पुच्छीय एवं दो पुच्छीय परीक्षण के अंतर को विस्तार से समझाया तथा विभिन्न सूत्रों के माध्यम से परिकल्पना परीक्षण प्रक्रिया की बारीकियों को स्पष्ट किया।
कार्यशाला का शुभारंभ मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन द्वारा हुआ।महाविद्यालय प्रबंधक डॉ विजयलक्ष्मी मिश्रा ने अतिथि परिचय कराते हुए उनका स्वागत किया।
कार्यक्रम का संचालन एम एड विभागाध्यक्ष डॉ रेखा श्रीवास्तव ने किया तथा आभार ज्ञापन महाविद्यालय प्राचार्य डॉ सुमन सिंह ने किया। कार्यक्रम का समापन वंदे मातरम से हुआ।
इस अवसर पर डॉ अपर्णा मिश्रा, डॉ वीरेंद्र गुप्त, डॉ आस्था प्रकाश, डॉ सारिका जायसवाल, डॉ अनीता सिंह, डॉ शिवानी श्रीवास्तव डॉ रेखा रानी शर्मा, डॉ विकास कुमार श्रीवास्तव,श्री अनंत कुमार पाठक,श्रीमती देवता पांडेय श्रीमती सोनू दुबे, श्रीमती श्वेता सिंह,श्री पवन कुमार श्री अरुण मणि त्रिपाठी आदि शिक्षकगण के साथ ही एम एड विभाग की सभी छात्राएं उपस्थित रहीं।
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