शहाबुद्दीन अहमद
बेतिया, बिहार।
सरकार द्वारा घोषित दुकानों की साप्ताहिक बंदी का खुल्लम-खुल्ला मजाक उड़ाया जा रहा है।छोटे से लेकर बड़े दुकानदार,प्रतिष्ठान के मालिक जो कर्मियों को रखकर दुकान का काम लेते हैं,वह एक दिन भी अपने अधीनस्थ दुकान में काम करने वाले मजदूरों को छुट्टी नहीं देते हैं,जबकि सरकार के द्वारा यह पर्व से ही घोषणा है कि प्रति रविवार को या सप्ताह में किसी एक दिन दुकानों प्रतिष्ठानों की साप्ताहिक अवकाश में दुकानों की बंदी रहेगी।शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश रविवार को देखने को मिलता है कि कोई भी दुकान या प्रतिष्ठान बंद नहीं रहता है,जबकि उनके प्रतिष्ठान दुकानों में मजदूर काम करते हैं जिन्हें एक दिन काअवकाश देना अत्याआवश्यक है।
सरकार के श्रम व नियोजन विभाग के निहित प्रावधानों के अंतर्गत यह नियम है कि जिन दुकानों,बड़े-बड़े प्रतिष्ठानों, फैक्ट्री,गोदाम,कल कारखानो में मजदूर काम करते हैं,उन्हें एक दिन का अवकाश देना नितांतआवश्यक है,जिन दुकानों,प्रतिष्ठानों,कल कारखानों,फैक्ट्रीयों,गोदामो के मालिक जो अपने यहां मजदूरों को रखकर काम करते हैं अगर वह एक दिन का अवकाश नहीं देते हैं तो वह बिहार और सरकार के श्रम विभाग के नियोजन विभाग के नियमों का उल्लंघन करते हैं,इस उलंघन के मामले में पकड़े जाने पर जुर्माने के साथ-साथ जेल की हवा खानी पड़ेगी। श्रम एवं नियोजन विभाग के पदाधिकारी भी इन दुकानदारों प्रतिष्ठानों कल कारखानों गोदाम ऑफ फैक्ट्री के मालिकों से मिलकर सुविधा शुल्क को शुरू करते हैं जिसके कारण वह इस पर ध्यान नहीं देते हैं और बेजबान मजदूर अपनी आर्थिक परेशानी के चलते कुछ कह नहीं पाते हैं, इसी का यह सभी मालिक नाजायज फायदा उठाते हैं।
श्रम व नियोजन विभाग के पदाधिकारी अगर किसी एक रविवार को भी छापामारी करें तो सारी वस्तुस्थिति सामने आ जाएगी,क्योंकि सभी दुकान के मालिक मजदूर बंदी अधिनियम का खुल्लम-खुल्ला मजाक उड़ाते हैं।साप्ताहिक बंदी अवकाश का नियम1953 से ही लागू हो गया था,जो आज तक लागू है,मगर श्रम व नियोजन विभाग के पदाधिकारी की आंख मचौली से मजदूर बंदी अधिनियम का खुल्लम-खुल्ला मजाक उड़ाया जा रहा है।
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