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पदाधिकारियों का सरकारी फोन बना मज़ाक, जनता मीडिया दोनों के लिए आदान प्रदान बंद

शहाबुद्दीन अहमद

बेतिया, बिहार

जिला में प्रशासनिकऔर पुलिसअधिकारियों का रवैया सवालों के घेरे में है।

सरकार ने जनता,मीडिया की सुविधा के लिएअधिकारियों को सरकारी मोबाइल नंबर उपलब्ध कराया था,ताकि समस्याओं को सुना जा सके और उनका समाधान निकल सके,लेकिन हकीकत इसके विपरीत है।अधिकारीऔर थानेदार इन नंबरों को उठाना अपनी शानऔर तोहिनी समझ बैठे हैं।जिला में यह स्थिति है कि अधिकतर थानेदारों का फोन बंद रहता है,और जिनका फोन चालू भी होता है,वे केवल दलालों, शराब माफियाओं और चहेतों की कॉल ही उठाते हैं।

आम जनता चाहे कितनी भी परेशानी में हो,उसका कॉल उठानाअफसरों के लिए “सरकारी रीति” नहीं बल्कि “अपमान” समझ लिया गया है।यह रवैया न केवल प्रशासनिक समन्वय पर सवाल खड़ा करता है,बल्कि सरकार की उस मंशा पर भी प्रश्नचिन्ह लगा देता है,जिसमें जनताऔर प्रशासन के बीच आपसी संवाद की बात कही जाती है।अब यह प्रश्न खड़ा हो रहा है कि क्या सरकारऔर सिस्टम सिर्फ़ कागजी घोषणा तक सीमित है?या जनताऔर मीडिया कोअबअपनी ही समस्याओं का समाधान सड़क और सोशल मीडिया पर खोजना होगा?यह कोई नई बात नहीं है,विगत काई वर्ष से यह देखनेऔर सुनने को मिलताआ रहा है,मगर जिला पदाधिकारी/पुलिस कप्तान के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रहा है,केवल यह लोग भाषणबाजी करते हैं,आदेश निर्गत करते हैं,मगर इनके आदेश को इनकेअधीनस्थ के कर्मी नहीं मानते हैं,तो फिर आम जनता, मीडिया कर्मी को कौन पूछता है? इसपर कोई नियंत्रण नहीं है,कोई कार्रवाई भी नहीं होती है।

Karunakar Ram Tripathi
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