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महाराष्ट्र में पर्वतों की स्थिति: विकास के नाम पर विनाश।

अनवर कादरी 

छत्रपती संभाजी नगर, औरंगाबाद, महाराष्ट्र।

जब राजस्थान में अरावली पर्वत श्रृंखला के संरक्षण के लिए जनभावना मुखर रूप से सामने आ रही है, तब यह सवाल स्वाभाविक है कि महाराष्ट्र में पर्वत श्रृंखलाओं की वास्तविक स्थिति क्या है? दुर्भाग्य से, यहाँ तस्वीर उतनी आशाजनक नहीं दिखाई देती। राज्य के कई हिस्सों में पर्वतों को काटकर बस्तियाँ बसाने, अवैध खनन करने और प्राकृतिक ढाँचों से छेड़छाड़ करने की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं।

अजंता पर्वत श्रृंखला: मराठवाड़ा की प्राकृतिक दीवार

अजंता पर्वतरांग (Ajanta Range) मराठवाड़ा की उत्तरी सीमा की तरह मानी जाती है। यह पर्वत श्रृंखला छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व औरंगाबाद) शहर को प्राकृतिक रूप से घेरे हुए है। दक्कन के पठार का यह उत्तर भाग गोदावरी और तापी नदियों की उपनदियों के बीच महत्वपूर्ण जलविभाजक के रूप में कार्य करता है।

यह क्षेत्र केवल भूगोल तक सीमित नहीं है, बल्कि जैवविविधता, जलस्रोतों और ऐतिहासिक विरासत की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

छत्रपति संभाजीनगर: पहाड़ खतरे में

छत्रपति संभाजीनगर और उसके आसपास के इलाकों—जैसे लेणी क्षेत्र, बेगमपुरा पहाड़, सिंगपुरा—में पहाड़ों को नुकसान पहुँचाने की खबरें बार-बार सामने आती रही हैं।

इन नुकसानों के पीछे कई कारण हैं:

अवैध खनन

अतिक्रमण और अनियंत्रित निर्माण

प्राकृतिक घटनाएँ जैसे भूस्खलन, जिन्हें मानव हस्तक्षेप और भी गंभीर बना देता है

हाल ही में खुल्दाबाद मार्ग पर पहाड़ी से मिट्टी और पत्थर गिरने की घटनाएँ सामने आईं, जिससे न केवल यातायात बल्कि आम नागरिकों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ी। इसके बावजूद, ऐतिहासिक और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण पहाड़ियों के संरक्षण में प्रशासनिक स्तर पर गंभीरता की कमी दिखती है।

कार्रवाई होती है, असर नहीं दिखता

औरंगाबाद लेणी, बेगमपुरा पहाड़ और सिंगपुरा क्षेत्र में अवैध खनन के खिलाफ बड़ी कार्रवाइयाँ जरूर की गईं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि

“कुछ असर नहीं”—खनन फिर शुरू हो जाता है, पहाड़ फिर कटने लगते हैं।

यह स्थिति दर्शाती है कि कार्रवाई अक्सर अस्थायी होती है और दीर्घकालीन संरक्षण नीति का अभाव है।

सवाल जनभावना का है

आज जरूरत है कि महाराष्ट्र में भी अरावली की तरह पर्वत संरक्षण को लेकर जनआंदोलन और राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई दे।

पर्वत केवल पत्थरों का ढेर नहीं हैं—वे:

जलस्रोतों के रक्षक हैं

जलवायु संतुलन बनाए रखते हैं

इतिहास और संस्कृति के साक्षी हैं

यदि अभी भी हम सचेत नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल कटे हुए पहाड़ों की तस्वीरें और पछतावा ही विरासत में मिलेगा।

अब सवाल यह नहीं है कि पहाड़ कट रहे हैं, सवाल यह है कि हम कब तक चुप रहेंगे?

Jr. Seraj Ahmad Quraishi
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