शहाबुद्वीन अहमद
बेतिया,पश्चिमी चंपारण, बिहार।
प्रतिदिन नगर एवं ग्रामीण क्षेत्रों के सड़कों पर 18 वर्ष से कम उम्र वाले बच्चों के द्वारा बाइक, स्कूटी,टेंपो,टांगा चलाने का नजारा सड़कों पर देखने को मिल रहा है,मगर ट्रैफिक, यातायात पुलिस प्रशासन मुकदर्शक बनकर देखता रहता है,जिससे इन कम उम्र वाले बच्चों का मनोबल बढ़ता जा रहा है,जिस घटना दुर्घटना की प्रतिशत प्रतिदिन बढ़ रहा है।यातायात थाना पुलिस,ट्रैफिक पुलिस जो सड़कों पर ड्यूटी निभा रही है,इनको यह भी समझ में नहीं आ रहा है कि इन छोटे-छोटे बच्चों के द्वारा गाड़ी चलाना कितना बड़ा अपराध है,इनके पास ना ड्राइविंग लाइसेंस है,न ही गाड़ी का कागजात ही पूरी तरह संधारित है,गाड़ी का टैक्स भी बकाया है,मगर फिर भी इन छोटे-छोटे,कमसिन,नाबालिग बच्चों के द्वारा सड़क पर गाड़ी को फराटे भरते हुए गाड़ियां को चला रहे हैं। इन बच्चों के
गार्जियन,माता-पिता,संबंधी भी कम जिम्मेवार नहीं है कि इन छोटे-छोटे बच्चों को गाड़ी चलाने की इजाजत दे दिए हुए हैं,और जब कोई घटना व दुर्घटना हो जाती है तो कई प्रकार के परेशानियों का सामना उनको करना पड़ता है। साथ-साथआर्थिक,शारीरिक, मानसिक परेशानियां को भी झेलना पड़ता है,मगर इन माता-पिता, गार्जियन,संबंधी को इनके नाबालिक बच्चों के द्वारा घटना दुर्घटना करने पर केवल अफसोस केअलावा कुछ हाथ नहीं लगता है।प्रतिदिन सड़कों पर 12 से16 साल के बच्चों को गाड़ी चलाते हुए देखा जा रहा है।यातायात पुलिस, ट्रैफिक पुलिस प्रशासन देखकर भी अंधी बनी बनी हुई है,यातायात पुलिस एवं ट्रैफिक पुलिस भी ऐसे नाबालिक बच्चों को गाड़ी चलाते हुए देख कर भी कुछ भी नहीं रोक टोक कर पाते हैं,जब वाहन जांच की प्रक्रिया चलती है तो भी वहआसानी से उनके सामने से गुजर जाते हैं,जिससे इन नाबालिक बच्चों को गाड़ी चलाने के लिए मनोबल बढ़ जाता है,जिससे वह हमेशा चलाते रहते हैं,इन नाबालिक बच्चों के दिमाग में यह बात भी बैठ जाती है कि पुलिस तो देखकर भी हमको नहीं रोक टोक नहीं कर पाती है,तो फिर क्यों नहीं हम गाड़ी को सड़कों पर चलाएंगे,भले ही दुर्घटना ही क्यों ना हो जाए।
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