शहाबुद्दीन अहमद
बेतिया, बिहार।
सरकार के द्वारा जमीनी विवाद की समस्या का हल करने के लिए दाखिल खारिज कैंप लगाया जाता है,जो नाम मात्र, छलावा और दिखावा के रूप में काम करता है। इस कैंप में आम जनता के द्वारा जो भी दाखिल खारिज करने के लिए अपने भूमि संबंधित दस्तावेज की छाया प्रति जमा की जाती है,वह केवल कार्यालय के लिए शोभा की वस्तु बन जाती है। कैम्प के नाम पर जनता परेशान होती है,साथ ही इस कैंप में बैठने वाले सरकारी कर्मी को घूस की राशि नहीं मिलने के कारण कागजात में कई तरह के ऐसा तैसा,त्रुटि को निकाल कर इसको छांट देते हैं जिसके कारण उस आदमी का दाखिल खारिज नहीं हो पता, इसमें स्थानीय संबंधित अंचल केअंचलाधिकारी एवं कर्मी उसे जमीनी दस्तावेज का दाखिल खारिज करने वाले जरूरी कागजात को छांट कर हटा देते हैं,ऐसा तैसाऑब्जेक्शन लगते हैं,जिसको संबंधित लोग उसमें सुधार नहीं कर पाते हैं, सभी कागजात कार्यालय में लटका रहता है।सूत्रों के अनुसार,अंचलाधिकारी का कार्यालय में नहीं बैठने की शिकायत भी हमेशा मिलती रहती है,ऐसा लगता है कि संबंधितअधिकारी को पब्लिक फेस करने में कठिनाइयां का सामना करना पड़ता है।लगभग महीनो बीत जाने के बाद भी कुछ ही दिन के लिएअपने कार्यालय में बैठेते हैं।दाखिल खारिज का मामला सही समय पर नहीं होने से जमीनी विवाद गहराता जाता है,साथ ही जमीनी विवाद में कई लोगों की जान भी चली जाती हैं,मगर इसका निपटारा नहीं हो पता है। सरकार अपने स्तर से इस समस्या को समाधान करने के लिए तत्पर तो रहती है मगर नीचे स्तर के अधिकारी इसको करना नहीं चाहते हैं,क्योंकि उनका पॉकेट गर्म नहीं होता है,तभी ही सभी कागजातों को लटकाए रहते हैं ताकि संबंधितआदमी के आने के बाद उससे लेनदेन करके उसका काम करने के लिए प्रेरित होते हैं।
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