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दीपों का त्योहार दीपावली जनमानस का त्यौहार,अंधकार पर प्रकाश की शक्ति प्रदान।

शहाबुद्दीन अहमद

बेतिया(पश्चिमी चंपारण)बिहार।

दीपों का त्योहार दीपावली को रोशनी का त्यौहार भी कहा जाता है,यह अंधकार पर प्रकाश की शक्ति और अज्ञानता पर ज्ञान की शक्ति के अध्यात्मिक संदेश का प्रतिनिधित्व करता है। दीपावली का पर्व सिखों और जैनियों,पारसियों,ईसाई द्वारा भी खुशी से मनाया जाता है। इसीलिए इसको जनमानस का त्यौहार भी कहा जाता है। इस त्यौहार का आध्यात्मिक महत्व बुराई पर अच्छाई और अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है। इस उत्सव में धन व शक्ति लक्ष्मी और बुद्धि के देवता गणेश का सम्मान किया जाता है।पूरे देश में भौगोलिक स्थिति के आधार पर इसका धार्मिक महत्व अलग-अलग है,यह कहीं राम कहानी,राम सीता और लक्ष्मण के 14 साल के लंबे वनवास के बाद घर आने की सम्मान में मनाया जाता है, कुछ लोग इसे हिंदू महाकाव्य महाभारत में वर्णित 12 साल के बनवास और 1 साल के अज्ञातवास के बाद पांडवों की अपने पराजय में वापसी की याद में मनाते हैं।

भारतीय संस्कृति में दीपावली आलोकअर्थात प्रकाश का पर्व माना जाता है। जीवन के अर्थ और खुशियां तभी उजागर होते हैं,जब प्रकाश सिर्फ सनातन धर्म में ही नहीं भारत में अन्य धर्म में भी इस दिन का खास महत्व है।जीवन के तमस को मिटाने के लिए दीपावली मनाते हैं।दीपावली के पर्व पर हम ऐश्वर्या प्रदायिनी मां लक्ष्मी से प्रार्थना करते हैं कि तामस और अंधकार को पैदा करने वाली अग्यंजन नकारात्मक प्रवृत्तियां नष्ट होती हैं,अंतर में अभ्यता प्रकट हो और सर्वत्र रूप संपन्नता विस्तृत हो हर घर आंगन बाहरी और आंतरिक ऊर्जा से भरे पड़े रहते हैं।

दीपावली पर्व पर मिट्टी के दीए जलाने का पौराणिक दृष्टिकोण से शुभ माना जाता है,इसके लिए कुमहार जाति को याद किया जाता है,इसी कारण दीप उत्सव के समय कुमहार को फुर्सत नहीं होती है।

दीपावली का त्योहार सन्निकट है,पर बाजार में मिट्टी के दिए और उनके लिए कुम्हार बहुत कम दिखाई दे रहे हैं,हम अपनी परंपराओं को भूलते जा रहे हैं, इस दीपावली के अवसर पर मिट्टी की दीप को छोड़कर,चाइनीस लाइट, विभिन्न प्रकार के खिलौने के लाइट केआगे हमारी आस्था का दिया बुझने लगा है। मिट्टी का दीपक पांच तत्वों से मिलकर बनता है,जिसकी तुलना मानव शरीर से की जाती है, पानी, आग, मिट्टी, हवा तथा आकाश तत्व मिट्टी के दीपक में मौजूद होते हैं। इतिहास में अगर ढूंढा जाए तो दीपक को मोमबत्ती,कंडील के पहले मनुष्य ने आग जलाना सीख लिया था,शुरुआत में, वनस्पति तेलों, पत्तियों और लकड़ियों का जलाया जाता था,नए आविष्कार के बाद मनुष्य ने इसे किसी ठोस वस्तु पर जालना शुरू किया था, उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है,पूर्व में मनुष्य ने दीपक की खोज की। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में पके हुए मिट्टी के दीपक प्राप्त हुए हैं,मोहनजोदड़ो में प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति को देखने से पता चलता है कि उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी,तभी तो मिट्टी के दिए मिले। मूर्ति में मातृ देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं।अध्यात्म के अनुसार हमारे शरीर में ऊर्जा चक्र होते हैं,जो घी का दिया जलाने से यह चक्र जागृत हो जाते हैं,जिससे इस शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है। इस दीपावली के अवसर परस्थानीय कुमहारों, हस्तशिल्पियों,किसानों को प्रोत्साहन मिलता है। दीपावली के दिन दीपों के जलने से हम पर्यावरण की सुरक्षा भी करते हैं। इस दीपावली में मिट्टी के दीए जलाएं और भारतीय संस्कृति को अपने दिए जलाने से कुम्हार के घर की भी खुशहाली आएगी,उनके घर भी दीप जलेंगे, दीपावली मनेगी।आज के इस अल्ट्रा मॉडर्न युग में लोगों ने अपनी सभ्यता को भुलाते हुए इस दीपावली पर्व को भी नए युग के अंदाज में मनाने की कोशिश कर रहे हैं मगर जो वस्तु स्थिति पौराणिक दृष्टिकोण से थी वह अब मिटाने के कगार पर आ गई है, मिट्टी के दीयों का अस्तित्व और मिटाने जा रहा है, अगर इस पर समाज के लोग ध्यान नहीं देंगे तो आने वाले कुछ वर्षों में दीपावली के दिन भी मिट्टी के दीपों के जलाने का अस्तित्व भी खत्म हो ही जाएगा,जिससे हम अपनी सभ्यता को भूल रहे हैं।

Karunakar Ram Tripathi
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