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ईद रोजेदारों के लिए अल्लाह का ईनाम है - उलमा किराम

सैय्यद फरहान अहमद

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।

रोजेदारों ने नमाज पढ़कर, कुरआन-ए-पाक की तिलावत करके गुनाहों की माफी मांगी। मुफ्ती मुहम्मद शुएब रजा निजामी ने बताया कि हदीस में है कि जब ईद-उल-फित्र की मुबारक रात तशरीफ लाती है तो इसे लैलतुल जाइजा यानी ईनाम की रात के नाम से पुकारा जाता है। ईद-उल-फित्र और ईद-उल-अजहा की रात में सवाब के लिए खूब इबादत करनी चाहिए। पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि ईद तो दरअसल उन खुशनसीब मुसलमानों के लिए है जिन्होंने रमजानुल मुबारक को रोजा, नमाज और दीगर इबादतों में गुजारा, तो यह ईद उनके लिए अल्लाह की तरफ से मजदूरी मिलने का दिन है। ईद की नमाज से पहले सदका-ए-फित्र अदा कर देना चाहिए। कसरत से सदका देना चाहिए। आपस में मुबारकबाद देना बाद नमाजे ईद हाथ मिलाना और गले मिलना बेहतर है। इससे भाईचारगी बढ़ती है।

शहर काजी मुफ्ती मुहम्मद अजहर शम्सी ने कहा कि ईद की रात बहुत बरकत वाली होती है लिहाजा इसे इबादत में गुजारें। ईद की रात ईनाम मिलने की रात है, इसे घूम टहल कर बाजार में बर्बाद न करें। नमाज की पाबंदी करें। कुरआन-ए-पाक की तिलावत करें और अल्लाह पाक के हुक्म पर जिंदगी गुजारें। झूठ, फरेब, रिश्वतखोरी से खुद को बचाएं। बेहूदा कलमात जबान से न निकालें। चुगली न करें।

मौलाना जहांगीर अहमद ने बताया कि ईद सिर्फ मजहबी त्योहार ही नहीं है बल्कि यह इंसानियत का भी त्योहार है। यह उन अहसासों का त्योहार है, जो इंसानियत के लिए बेहद जरूरी हैं और उनकी बुनियाद हैं। जकात एवं सदका-ए-फित्र की व्यवस्था सामाजिक न्याय एवं आर्थिक विपन्नता को ध्यान में रखकर ही की गयी है।

मौलाना महमूद रजा कादरी ने बताया कि हमें अल्लाह के हुक्म के मुताबिक जिंदगी गुजारनी चाहिए। गरीबों, यतीमों, फकीरों की जकात व फित्रा से मदद करें। ईद की रात को गफलत में न गुजारें बल्कि इबादत करें। बुराई से दूर रहे हैं। कुरआन व हदीस के मुताबिक मुसलमान बनें।

नूरी मस्जिद तुर्कमानपुर के सदर अलाउद्दीन निजामी ने कहा कि रमजान में प्रत्येक इंसान हर तरह की बुराइयों व गुनाहों से खुद को बचाता है। रमजान की रातों में एक रात शबे कद्र कहलाती है। यह रात बड़ी खैर ओ बरकत वाली है। कुरआन में इसे हजारों महीनों से अफजल बताया गया है। यह वह पाक रात है, जिसमें हजरत जिब्राइल अलैहिस्सलाम फरिश्तों की एक बड़ी जमात लेकर जमीन पर तशरीफ लाते हैं। अल्लाह के हुक्म से पूरी दुनिया का चक्कर लगाते हैं। इबादत में रात गुजारने वालों के लिए दुआएं करते हैं और मुबारकबादी पेश करते हैं। पूरी रात चारों तरफ सलामती ही सलामती रहती है। फज्र का वक्त होते-होते यह नूरी काफिला वापस चला जाता है। रमजान के आखिरी अशरा की 21, 23, 25, 27 व 29वीं रातों को शबे कद्र की रात बताया गया है।

भूल कर खाने से रोजा नहीं टूटता : उलमा किराम 

रमजान हेल्पलाइन नंबर 8604887862, 9598348521, 9956971232, 7860799059 पर मंगलवार को सवाल ओ जवाब का सिलसिला जारी रहा। 

1. सवाल : भूल कर कुछ खा लिया तो रोजा टूटेगा या नहीं? 

जवाब : नहीं। रोजा याद न होने की सूरत में भूल कर खाने से रोजा नहीं टूटता। हां याद आने पर फौरन रुक जाएं बल्कि मुंह में मौजूद लुकमा भी निकाल दें।

Jr. Seraj Ahmad Quraishi
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