गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।
‘जिक्रे शुहदाए कर्बला’ महफिलों के नाम रहा। उलमा किराम ने दीन-ए-इस्लाम, शहादत और कर्बला के बाबत विस्तार से बयान किया। सातवीं मुहर्रम को करीब एक दर्जन से अधिक मस्जिदों में ‘जिक्रे शुहदाए कर्बला’ महफिलों का दौर जारी रहा। मुहर्रम की सातवीं तारीख को जालिम यजीदियों ने हजरत इमाम हुसैन व उनके साथियों के लिए पानी पर रोक लगा दी थी। कर्बला का वाकया सुनकर अकीदतमंद इमाम हुसैन की याद में डूब गए। फातिहा ख्वानी हुई।
बच्चों ने की सामूहिक कुरआन ख्वानी, इमाम हुसैन की जिंदगी पर डाली गई रोशनी।
जामिया अल इस्लाह एकेडमी नौरंगाबाद गोरखनाथ में बच्चों के लिए 'हमारे हैं हुसैन' विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई। बच्चों को इमाम हुसैन की जिंदगी व मिशन के बारे में बताया गया। बच्चों ने सामूहिक कुरआन ख्वानी की। मुख्य वक्ता मुहम्मद अनस ने कहा कि इमाम हुसैन ने इस्लाम धर्म की खातिर सब कुछ कुर्बान कर दिया लेकिन जुल्म करने वालों के आगे सिर नहीं झुकाया। इमाम हुसैन ने इस्लाम धर्म का झंडा बुलंद कर नमाज, रोजा, अजान व शरीअत की हिफाजत की। अल्लाह के आखिरी पैगंबर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नवासे हजरत इमाम हुसैन ने कर्बला के मैदान में जुल्म के खिलाफ सबसे बड़ी जंग लड़ी और इंसानियत व दीन-ए-इस्लाम को बचाने के लिए अपने साथियों की कुर्बानी दी। शहादत-ए-इमाम हुसैन ने दीन-ए-इस्लाम की अजमत को कयामत तक के लिए बचा लिया। यह पूरी दुनिया के लिए त्याग व कुर्बानी की बेमिसाल शहादत है।
अध्यक्षता करते हुए शिक्षक आसिफ महमूद ने कहा कि जो लोग अल्लाह की राह में अपनी जान कुर्बान कर देते हैं वह शहीद हो जाते हैं और शहीद कभी नहीं मरता बल्कि वह जिंदा रहता है। इमाम हुसैन व उनके जांनिसार आज भी जिंदा हैं। कर्बला से हक की राह में कुर्बान हो जाने का सबक मिलता है। कर्बला के शहीदों की कुर्बानियों से ताकतवर से ताकतवर के सामने हक के लिए डटे रहने का जज्बा पैदा होता है। यदि आपको इमाम हुसैन से सच्ची मुहब्बत है तो उनके नक्शे कदम पर चलने की पूरी कोशिश कीजिए। अंत में दुरूदो सलाम पढ़कर मुल्क में अमन ओ अमान की दुआ मांगी गई। संगोष्ठी में अली अहमद, आयशा खातून, शिरीन आसिफ, फरीदा खातून, आरजू अंसारी, अदीबा अंसारी, फरहीन जहां, गुलफ्शा, बेलाल अहमद, हस्सान आसिफ, आयशा, सना, यास्मीन, नाजिया, सैयदा, साफिया, फरहत, तानिया, जुवैरिया, अफसाना, फिरदौस, नफीसा सहित तमाम बच्चे मौजूद रहे।
महफिल जिक्रे शुहदाए कर्बला जारी
मकतब इस्लामियात चिंगी शहीद इमाम चौक तुर्कमानपुर में शहर काजी मुफ्ती मुहम्मद अजहर शम्सी व गाजी मस्जिद गाजी रौजा में महफिल जिक्रे शुहदाए कर्बला के तहत मुफ्ती अख्तर हुसैन ने कहा कि अहले बैत से मुहब्बत करने वाला जन्नत में जाएगा। हजरत इमाम हुसैन की शहादत हमें इंसानियत का शिक्षा देती है। पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया है कि जो शख्स अहले बैत से दुश्मनी रखता है वह मुनाफिक है।
गुलशने रजा एकेडमी तुर्कमानपुर में आलिमा सबीहा खातून ने कहा कि इस्लाम की तारीख शहादतों से भरी पड़ी है। पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बताए इस्लाम को समझना है तो पहले कर्बला को जानना बेहद जरूरी है। इमाम हुसैन हक की जंग तभी जीत गए थे जब सिपहसालार ‘हुर' यजीद की हजारों की फौज छोड़कर मुट्ठी भर हुसैनी लश्कर में अपने बेटों के साथ शामिल हो गए थे। हुर जानते थे कि इमाम हुसैन की तरफ जन्नती लोग हैं और यजीद की तरफ जहन्नमी लोग हैं।
सुन्नी बहादुरिया जामा मस्जिद रहमतनगर में मौलाना अली अहमद ने कहा कि इमाम हुसैन के साथ मक्का शरीफ से इराक की ओर सफर करने वालों में आपके तीन पुत्र हजरत अली औसत (इमाम जैनुल आबेदीन), हजरत अली अकबर, छह माह के हजरत अली असगर शामिल थे। इमाम हुसैन के काफिले में कुल 91 लोग थे। जिसमें 19 अहले बैत और अन्य 72 जांनिसार थे। इमाम हुसैन की याद में गौसे आजम फाउंडेशन ने गौसिया मस्जिद छोटे काजीपुर के पास कोल्डड्रिंक बांटी।
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