शहाबुद्दीन अहमद
बेतिया, बिहार।
बिहार में कालेजों केआभाव में सैकड़ों वित्तरहित कालेज खोले गए,जिसकी जांचोपरांत बिहार इंटरमीडिएट काउंसिल के द्वारा मान्यता दी गई,जो लगभाग चार दशक से संचालित हैं,बिहार के लगभाग 60 प्रतिशत छात्रों को शिक्षा देने का काम इन्ही वितरहित संस्थानों ने किया,आज सरकार की नीति से कर्मी भुखमरी के कगार पर हैं,साथ ही इन संस्थानों का भविष्य भी संकट में पड़ा है। वर्षों संघर्ष के बाद,नीतीश सरकार ने 2008 में वित्तरहित समाप्ति की घोषणा कर,वित्तरहित कर्मियों को वार्षिक परीक्षा परिणाम पर उत्तीर्ण हुए छात्रों के अनुपात में अनुदान देने की घोषणा की,दो चार वर्ष अनुदान निर्गत भी हुआ,मगर 2014 से अनुदान बाकी है, इसी बीच बिहार बोर्ड का आदेश हुआ कि 2016 से सभी अनुदानित कालेजों की मान्यता समाप्त कर दी गई, अब नए नियमावली 11/13 के मापदंड केअनुसार पुन जांच कराकर मान्यता लेनी होगी,साथ ही जांचोंप्रांत सही पाए जाने पर मान्यता मिलेगी, उन्ही को अनुदान मिलेगा। एक तरफ परीक्षा परिणाम के आधार पर अनुदान देना था,जो 2023 तक परीक्षा परिणाम घोषित हो चुके हैं, तोअनुदान क्यों नहीं?बोर्ड का तर्क है कि मान्यता समाप्त हो चुकी थी,अगर मान्यता समाप्त हो चुकी थी तो नामांकन क्यों कराया गया,पंजीयन व परीक्षा फॉर्म क्यों भरवाया गया,जब कर्मी कार्य किए है तो अनुदान कैसे रोक रखा है,यह शिक्षा विभाग की हिटलरशाही रवैया नहीं तो और क्या है?अभी नए
नियमावली सेअगर किसी कालेज को मान्यता मिल रही है,तो तीनों संकाय में कुल 280 छात्रों का ही नामांकन होगा,पहले इन कालेजों में तीनों संकाय में1152 छात्रों सहित अतिरिक्त सीट वृद्धि भी होती थी,जिसके आंतरिक आय सेआर्थिक सहयोग होता था,अभी 280 छात्रों से एक साल में कुल आय लगभग 20 लाख ही होगा,साथ ही कर्मियों का भुगतान एक दैनिक मजदूर के दर पर भी किया जाय तो सालाना भुगतान कम से कम 60 लाख होगा,यह राशि कहां सेआएगा,यह सोचनीय विषय है,सरकार को इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है,ताकि शिक्षा प्रणाली में सुधार हो सके।इस बात की जानकारी, शिक्षक नेता सह एनसीपी के प्रदेश प्रवक्ता,प्रोफेसर प्रवेज आलम ने दी है।
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