बेरोजगारों को नहीं मिल रहा है रोजगार।
रोजगार के अभाव मजदूर कर रहे है पलायन में।
40 प्रतिशत राशि चला जाता है कमीशनखोरी।
धरहरा सहित कई प्रखंडों में पक्की कार्य ठप।
डॉ शशि कांत सुमन
मुंगेर, बिहार।
मुंगेर जिले में मनरेगा योजना में मची लूट-खसोट के कारण मजदूरों को रोजगार नहीं मिल पा रहा है। रोजगार के अभाव में यहां के मजदूर रोजगार की तलाश में अन्य राज्यो की ओर पलायन करने को विवश है। बेरोजगारों को स्थानीय स्तर पर रोजगार दिलाने के लिये केंद्र सरकार की अति महत्वाकांक्षी योजना है। इस योजना के तहत मजदूरों को एक साल में 100 दिन रोजगार देने की गारंटी है। दुर्भाग्य है कि सुशासन सरकार में भ्र्ष्टाचार पर रोक लगाये जाने की तमाम कवायद के बाबजूद भी जिले में मनरेगा योजना में लूट-खसोट पर अब तक रोक नहीं लग पाया है। लॉकडाउन में अन्य प्रदेश में हुई फजीहत के कारण प्रवासी मजदूर को आशा थी कि मनरेगा में रोजगार मिलेगा। लेकिन वह सपना भी बेकार ही साबित हुआ।
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रोजगार नहीं मिलने के कारण मजदूरों का हो रहा है पलायन।
जिले में आवंटन की कमी व मनरेगा कर्मियों की लापरवाही के कारण जिले के लोगों को 100 दिन रोजगार नहीं मिल रहा है, जिसके कारण मजदूरों का गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, दिल्ली सहित अन्य राज्यों की ओर दो जून की रोटी की तलाश में परिवार के साथ पलायन कर रहे है। वर्तमान में मिट्टी कार्य के साथ ही प्रखंड में मनरेगा के सभी कार्य ठप है। 60-40 रेशियो नियमतः तह नहीं होने के कारण धरहरा सहित कई प्रखंडों में पक्की कार्य पूर्णरूपेण ठप है। इसके कारण पक्की सड़क, नाला,पुल-पुलिया, चेकडेम का कार्य नहीं होने से जहां विकास कार्य बाधित है वहीं मजदूरों को रोजगार नही मिल पा रहा है। जिसके कारण मजदूरों के समक्ष दो जून की रोटी जुगाड़ करना भी मुश्किल हो रहा है।
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40 प्रतिशत राशि हड़प जाते है कमीशन खोरी में।
इस योजना में मची लूट -खसोट के मजदूरों को रोजगार देने की कोई गारंटी नहीं रह गयी है। एक तरफ बाढ़ तो दूसरी और सुखाड़ की विभीषिका झेल रही प्रखंड के गरीब तबके के लोग रोजगार के लिये दर-दर भटक रहे है। रोजगार के अभाव में गरीब परिवार के घरों में चूल्हा जलना भी मुश्किल हो गया है। बताया जाता है कि मनरेगा योजना का 40 प्रतिशत राशि परत-दर-परत कमीशनखोरी में चला जाता है। योजना में व्याप्त कमीशनखोरी के चलते जहां निर्माण कार्यो में गुणवत्ता का कोई ख्याल नहीं रखा जाता है। वही सरकारी राशि का गबन भी खुलेआम किया जा रहा है। विश्वतसूत्रो की माने तो इस्टीमेट बनाने से जो कमीशनखोरी का खेल शुरू होता था वह कार्य के पूर्ण होने तक चलते रहता है। सूत्रों की मानें तो इस्टीमेट बनाने में जूनियर इंजीनियर 2 प्रतिशत, तकनीकी स्वीकृति में असिस्टेंट इंजिनियर 1 प्रतिशत, एक्सक्यूटिव इंजिनियर1प्रतिशत, प्रशासनिक स्वीकृति में मुखिया, प्रखंड कार्यक्रम पदाधिकारी 5-5 प्रतिशत, रनिंग बिल पर जूनियर और सहायक अभियंता 5-5 प्रतिशत, मुखिया,प्रखंड कार्यक्रम पदाधिकारी 5-5 प्रतिशत, जूनियर, सहायक इंजीनियर 5-5 प्रतिशत, पंचायत रोजगार सेवक 5 प्रतिशत प्रशासनिक में और 5 प्रतिशत रनिंग बिल पर 5 प्रतिशत राशि कमीशनखोरी में हजम कर जाते है। नियमतः इस कार्य के क्रियान्वयन की जिम्मेवारी पंचायत रोजगार सेवक की है, लेकिन इन कार्यो को बिचौलिया के माध्यम से करा जाता है।
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क्या कहते है प्रखंडवासी
प्रखंड दर्जनों प्रवासी मजदूरों ने बताया कि मनरेगा में रोजगार कैसे मिलेगा । यह पता ही चल पाता है। पंचायत रोजगार सेवक पंचायत नहीं आते है। यदि कभी आते भी तो मूखिया की दरबारी कर चले जाते है। रोजगार के प्रखंड मुख्यालय का चक्कर लगा रहे है। लेकिन प्रखंड मुख्यालय में भी रोजगार सेवक नही मिल रहा है। रोजगार मिलना तो दूर कोई सही-सही जानकारी भी नहीं देता है।
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