शहाबुद्दीन अहमद
बेतिया,पश्चिमी चंपारण, बिहार।
प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी जिला के शिक्षण संस्थानों, कार्यालय में,भारतीय संविधान के निर्माता,डॉ भीमराव अंबेडकर की पुण्यतिथि बड़ी श्रद्धापूर्वक,धूमधाम से मनाई गई।इस कार्यक्रम में,उपस्थित सभी महानुभावों ने उनकी जीवनवृतांत को दर्शाते हुए उनके कार्यकाल को स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाने की बात को दोहराते हुए उपस्थित जनसमूह की याद ताजा कराई । इस महान विभूति का जन्म 1 अप्रैल1891को मध्य प्रदेश के महू में हुआ था। इनके पिता का नाम रामजी राव,माता का नाम भीमाबाई था,इस दिन भारत समेत पूरी दुनिया में अंबेडकर जयंती मनाई जाती है।दलित युवा परिवार में जन्म लेने और भेदभाव का सामना करते हुए भी अपने मजबूत इच्छा शक्ति और लगन से उन्होंने उच्च शिक्षा पाई थी, उन्होंने अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स में शोधकार्य किया,जिससे उनकी डॉक्टर की उपाधि मिली पढ़ाई के बाद वहअर्थशास्त्र के प्रोफेसर बने,फिर वकालत की और बाद में उनका जीवन राजनीति से जुड़ गया। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी उन्होंने भाग लिया और देश के स्वतंत्रता के बाद देश के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। वक्ताओं ने अपने-अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि संविधान निर्माण का श्रेय उनको जाता है,उनको भारतीय संविधान का जनक भी कहा जाता है। देश का संविधान बनाने के लिए संविधान सभा बनी,जिसमें अनेक लोग शामिल थे।डॉ भीमराव अंबेडकर उसकी ड्राफ्ट कमेटी केअध्यक्ष थे, शासन व्यवस्था नागरिकों के मौलिकअधिकार,कर्तव्य, वंचित वर्गों के अधिकार से संविधान नियम कानून बने इसे बनाने में लगभग 3 वर्ष लगे, इस पर काम 9 दिसंबर 1946 को शुरू हुआ और 26 नवंबर 1949 को पूरा हुआ,क्योंकि इसकी फाइनल ड्राफ्टिंग,डॉ भीमरावअंबेडकर ने की, इसलिए उनको उनको संविधान का जनक भी कहा जाता है,लोग सम्मान से उनको बाबा साहब भीमराव अंबेडकर भी कहते हैं। देश कीआजादी के बाद भारत के पहले कानून न्याय मंत्री बने।उन्होंने गरीबों, वंचितों,दलितों,महिलाओं के अधिकार,समाज के सुधार के लिए बहुत सारे काम किए, लोगों में जागरूकता लाई,बाद में उन्होंने बौद्धधर्म अपना लिया था,अपनी मृत्यु के ठीक पहले उन्होंनेअपनी आत्मकथा "वेटिंग फॉर ए विजा" पुरी की।
डॉ भीमराव अंबेडकर का निधन 6 दिसंबर 1956 को दिल्ली में हुआ,उनकी समाधि चैत्यभूमि मुंबई में स्थित है। वर्ष1990 में भारत सरकार ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से उनको मृत्युउपरांत भारत रत्न से सुशोभित किया।
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