ज़िया उल मुस्तफ़ा निज़ामी_
_(महासचिव: ऑल इंडिया बज़्म-ए-निज़ामी)_
संत कबीर नगर, उत्तर प्रदेश।
8 ज़िल्हिज्जा की सुबह से हज की औपचारिक शुरुआत हो जाती है। अगले पांच दिन (हज के दिन) पूरी हरमैन शरीफ़ैन (मक्का-मदीना) की यात्रा का सबसे अहम हिस्सा होते हैं। इसलिए इन पवित्र दिनों के सभी विवरण और नियम-कायदे हाजियों (तीर्थयात्रियों) के ज़हन में होने चाहिए। नीचे हम इन पांच दिनों की गतिविधियों का क्रमवार विवरण दे रहे हैं, ताकि हज यात्री इन दिनों का ज़्यादा से ज़्यादा फायदा उठा सकें।
_*हज का पहला दिन: 8 ज़िल्हिज्जा (यौम-उत-तरविया)*_
ज़िल्हिज्जा की आठवीं तारीख को 'यौमे तरविया' भी कहा जाता है। अगर आपने 'हज-ए-तमत्तु' का एहराम (हज के खास कपड़े) बांधा था, तो उमराह करने के बाद आप एहराम खोल चुके होंगे।
एहराम और नीयत
आज सुबह गुस्ल करके, इत्र लगाकर हरम शरीफ़ आएं और ख़ाना-ए-काबा का तवाफ़ करें। इसके बाद मकाम-ए-इब्राहीम के सामने तवाफ़ की दो रकात नमाज़ पढ़ें। फिर दो रकात नमाज़ एहराम की सुन्नत की नीयत से पढ़ें और उसके बाद हज की नीयत करें। नीयत के शब्द बोलते ही ज़ोर से तीन बार 'लब्बैक' कहें। अब आपका यह लब्बैक कहना 10 ज़िल्हिज्जा को रमी जमार (शैतान को कंकड़ मारने) के समय खत्म होगा।
मिना के लिए रवाना होना
अब फ़ज्र की नमाज़ पढ़कर, सूरज निकलने के बाद मिना की तरफ चलें। ज़ुहर की नमाज़ के समय तक वहां पहुंच जाना सुन्नत है, क्योंकि ज़ुहर से लेकर अगले दिन की फ़ज्र तक पांचों वक्त की नमाज़ें वहां पढ़ना 'सुन्नत-ए-मुअक्कदा' है।
खास बात: अगर अल्लाह तआला ताकत दे, तो मिना और अराफ़ात का रास्ता पैदल तय करें, क्योंकि धार्मिक किताबों के मुताबिक मक्का वापसी तक हर कदम पर बेशुमार नेकियां लिखी जाती हैं, जो इन पांच दिनों की सबसे बड़ी दौलत हैं।
• मिना जाते समय लब्बैक, दुरूद शरीफ़ और दुआ ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ें। जब मिना दिखाई दे तो यह दुआ पढ़ें:
अल्लाहुम्मा हाज़िही मिनन फ़म्नुन् अलैय बिका म नन्त् बिही अला औलियाइक'*
(अर्थ: ऐ अल्लाह! यह तेरे फ़ज़्ल और करम में से है, इसलिए मुझ पर भी वैसी ही मेहरबानी फ़रमा जैसी तूने अपने नेक बंदों पर फ़रमाई है।)
• मस्जिद-ए-ख़ैफ़ या अपने तंबू में पांचों वक्त की नमाज़ें अदा करें। मिना की नौवीं रात बहुत मुबारक होती है। पूरी रात अल्लाह की इबादत और ज़िक्र में गुजारें। हदीस का सार है कि जो व्यक्ति नौवीं ज़िल्हिज्जा की रात में एक हज़ार बार अल्लाह की पाकी बयान करने वाली खास दुआ पढ़ता है, वह अल्लाह से जो मांगता है, उसे अता किया जाता है।
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_*हज का दूसरा दिन: 9 ज़िल्हिज्जा (यौम-ए-अरफ़ा)*_
नौवीं ज़िल्हिज्जा को 'यौम-ए-अरफ़ा' कहा जाता है, जो हज का सबसे बड़ा रुक्न है। आज सुबह फ़ज्र की नमाज़ के बाद लब्बैक और दुआओं में मशगूल रहें। जब सूरज थोड़ा ऊपर आ जाए, तो अराफ़ात के मैदान की तरफ रवाना हों।
मैदान-ए-अराफ़ात की अहमियत
यह वही मैदान है जहां हज़रत आदम عَلَيْهِ السَّلَام की तौबा कबूल हुई थी और बीबी हव्वा से उनकी मुलाक़ात हुई थी। इसी पवित्र जगह पर नबी-ए-करीम ﷺ ने अपने आख़िरी हज के मौके पर वकूफ़ किया था और कुरआन की यह आयत नाज़िल हुई थी:
“आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया और तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी...”
वकूफ़-ए-अरफ़ा (हज का सबसे अहम फ़र्ज़)
नौवीं ज़िल्हिज्जा को दोपहर ढलने के बाद से लेकर दसवीं की सुबह होने से पहले तक किसी भी समय अराफ़ात के मैदान में पहुंचना और ठहरना फ़र्ज़ है। अगर यह छूट जाए, तो हज पूरा नहीं होता।
• दोपहर ढलते ही मस्जिद-ए-नमिरा की तरफ जाएं, जहां इमाम के साथ ज़ुहर और असर की नमाज़ें एक साथ पढ़ी जाती हैं। अगर आप अपने तंबू में नमाज़ पढ़ रहे हों, तो हनफ़ी मसलक के मुताबिक अपने-अपने समय पर नमाज़ पढ़ें।
• नमाज़ के बाद सूरज डूबने तक का पूरा समय दुआ और इस्तिग़फ़ार में गुजारें। सबसे बेहतर यह है कि जबल-ए-रहमत के पास काबा की तरफ मुंह करके खड़े होकर दुआ करें, वरना अपने तंबू में ही पूरे दिल से हाथ उठाकर दुआ करें।
मुज़दलिफ़ा के लिए रवाना होना
सूरज डूबते ही मगरिब की नमाज़ पढ़े बिना मुज़दलिफ़ा के लिए रवाना हो जाएं। मुज़दलिफ़ा में दाखिल होते समय यह दुआ पढ़ें:
'अल्लाहुम्मा हर्रिम् लह्मी व अज़्मी व शह्मी व शअरी व साइर जवारिही अलन्नारि या अर्हमर राहिमीन'
(अर्थ: ऐ अल्लाह! मेरे गोश्त, हड्डी, चर्बी, बाल और मेरे तमाम अंगों को जहन्नम की आग पर हराम फ़रमा दे, ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले!)
नमाज़ों को एक साथ पढ़ना
मुज़दलिफ़ा पहुंचकर ईशा के वक्त में मगरिब और ईशा की नमाज़ें एक साथ एक ही अज़ान के साथ पढ़ी जाएंगी।
मुज़दलिफ़ा की रात और कंकड़ चुनना
यह रात माफ़ी और अल्लाह की रहमत की रात है। इसे इबादत में गुजारें। यहीं से शैतानों को मारने के लिए खजूर की गुठली के बराबर 49 (उनचास) कंकड़ चुन लें और उन्हें साफ़ कर लें।
वकूफ़-ए-मुज़दलिफ़ा
सुबह होने के बाद और सूरज निकलने से पहले तक मुज़दलिफ़ा में ठहरना वाजिब है।
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_*हज का तीसरा दिन: 10 ज़िल्हिज्जा (यौम-उन-नह्र / ईद का दिन)*_
10 ज़िल्हिज्जा को सूर्योदय से पहले मिना के लिए रवाना हो जाएं। आज के दिन चार बड़े काम क्रम से करने होते हैं:
_*1. रमी (बड़े शैतान को कंकड़ मारना)*_
मिना पहुंचकर सीधे बड़े शैतान (जमरह-ए-अक़बा) के पास जाएं और कम से कम पांच हाथ की दूरी से एक-एक करके सात कंकड़ मारें। हर कंकड़ मारते समय बिस्मिल्लाह और तकबीर पढ़ें। पहला कंकड़ मारते ही लब्बैक कहना बंद कर दें। सातों कंकड़ अलग-अलग मारने हैं।
_*2. क़ुर्बानी*_
कंकड़ मारने के बाद क़ुर्बानी करें। यह हज करने वालों पर वाजिब है, क्योंकि यह हज का शुक्र अदा करना है।
_*3. हलक़ या तक़सीर (बाल मुंडवाना या कटवाना)*_
क़ुर्बानी के बाद मर्द अपने सिर के बाल मुंडवाएं, जो सबसे बेहतर है, या पूरे सिर के बाल थोड़ा कटवाएं। औरतों के लिए सिर्फ उंगली के एक पोर के बराबर बाल काटना काफी है, उनका सिर मुंडवाना मना है। इसके बाद एहराम की पाबंदियां खत्म हो जाएंगी और सिले हुए कपड़े पहन सकते हैं।
_*4. तवाफ़-ए-ज़ियारत*_
बाल कटवाने के बाद मक्का जाकर ख़ाना-ए-काबा का तवाफ़-ए-ज़ियारत करें। यह हज का दूसरा सबसे बड़ा फ़र्ज़ है, जिसके बिना हज पूरा नहीं होता। इसका सबसे बेहतर समय 10 ज़िल्हिज्जा है, हालांकि इसे 12 ज़िल्हिज्जा के सूरज डूबने से पहले तक किया जा सकता है। इसके बाद रात बिताने के लिए वापस मिना लौट आना सुन्नत है।
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_*हज का चौथा दिन: 11 ज़िल्हिज्जा*_
आज दोपहर ढलने के बाद तीनों शैतानों को क्रम से सात-सात कंकड़ मारने हैं:
_*1. जमरह-ए-ऊला (छोटा शैतान)*_ : पहले यहां 7 कंकड़ मारें, फिर थोड़ा आगे बढ़कर काबा की तरफ मुंह करके लंबी दुआ करें।
_*2. जमरह-ए-वुस्ता (मझला शैतान):*_ यहां भी 7 कंकड़ मारें और इसके बाद भी दुआ करें।
_*3. जमरह-ए-अक़ब (बड़ा शैतान):*_ आखिर में यहां 7 कंकड़ मारें, लेकिन यहां कंकड़ मारने के बाद बिना दुआ किए वापस लौट आएं।
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_*हज का पांचवां दिन: 12 ज़िल्हिज्जा*_
रमी जमार
आज भी दोपहर ढलने के बाद कल की तरह ही तीनों शैतानों को क्रम से सात-सात कंकड़ मारें। 12 ज़िल्हिज्जा को दोपहर से पहले कंकड़ मारना सही नहीं है।
मक्का वापसी
12 ज़िल्हिज्जा को तीनों जगह कंकड़ मारने के बाद सूरज डूबने से पहले मक्का के लिए रवाना हो जाएं। अगर मिना में ही सूरज डूब जाए, तो रात मिना में ही बिताना बेहतर है और अगले दिन (13 ज़िल्हिज्जा को) दोबारा दोपहर के बाद कंकड़ मारकर मक्का लौटना होगा।
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अल्लाह तआला के करम से 12 या 13 ज़िल्हिज्जा को कंकड़ मारने के बाद आपके हज के सभी अरकान पूरे हो जाते हैं। अब जब तक मक्का शरीफ़ में रहने का मौका मिले, ज़्यादा से ज़्यादा तवाफ़ और उमराह करें। अपने लिए, अपने वालिदैन, उस्तादों और पूरी इंसानियत व समाज के लिए दुआ करें। अल्लाह तआला आपकी इस मुबारक यात्रा और हज को कबूल फ़रमाए। आमीन!
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