सैय्यद फरहान अहमद
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।
माह-ए-रमजान के तीसरे जुमा की नमाज पढ़ने के लिए मस्जिदों में काफी भीड़ उमड़ी। सभी ने मस्जिदों में जुमा की नमाज अदा की। क्या बड़े और क्या छोटे सभी अल्लाह की इबादत में पलके बिछाए दिखे और 16वां रोजा रखकर अपनी आस्था प्रदर्शित की। रोजेदार रोजा रख कर अल्लाह की दी हुई नेमत का शुक्रिया अदा करने में जुटे रहे। माह-ए-रमजान के तीसरे जुमा की नमाज छोटी-बड़ी सभी मस्जिदों में पूरी दुनिया में अमन ओ सलामती की दुआ के साथ अदा की गई। तकरीरों में रोजा, नमाज, जकात, एतिकाफ, शबे कद्र की विशेषता बताई गई। पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम व अहले बैत पर दुरूद ओ सलाम का नजराना पेश किया गया। घरों में महिलाओं ने इबादत की। शाम को सबने मिलकर इफ्तार किया। बाजार में ईद की खरीदारी तेज है। चिश्तिया मस्जिद बक्शीपुर में मौलाना महमूद रजा कादरी, मदीना मस्जिद रेती में गुलाम जीलानी, बिलाल मस्जिद अलहदादपुर में हाफिज मोहम्मद आजाद व हाफिज गुलाम वारिस ने तरावीह नमाज में एक कुरआन-ए-पाक मुकम्मल किया। खुसूसी दुआ हुई।
मदीना मस्जिद रेती चौक के इमाम मुफ्ती मेराज अहमद कादरी ने कहा कि रमजान के महीने में अल्लाह की रहमत रूपी बारिश इंसान को पाक-साफ कर देती है। रमजान के पाक महीने में अल्लाह अपने बंदों पर खूब रहमतों की बारिश करता है। रमजान में तीस दिन तक इस बात की मश्क (अभ्यास) कराई जाती है कि जो काम तुम्हारे लिए जायज है, उसके लिए भी तुम खुद को रोक लो। तब इंसान यह महसूस करने लगता है कि जब मैं हलाल कमाई से हासिल किया गया खाना और पानी इस्तेमाल करने से खुद को रोक सकता हूं तो गलत काम करने से क्यों नहीं रोक सकता हूं। इंसान अक्सर यह सोचता है कि वह चाहकर भी खुद को गुनाह करने से रोक नहीं पाता, मगर यह उसकी गलतफहमी है। रमजान उसे इसका एहसास कराता है।
चिश्तिया मस्जिद बक्शीपुर के इमाम मौलाना महमूद रजा कादरी ने कहा कि जिसने ईमान के साथ सवाब की नियत से यानी रिया, शोहरत और दिखावे के लिए नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की खुशनूदी के लिए रात में इबादत के लिए खड़ा हुआ यानी नमाजे तरावीह और तहज्जुद पढ़ी तो उसके पिछले तमाम गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। एक और हदीस में है कि जो शख्स शबे कद्र (21, 23, 25, 27, 29 रमजान की रात) में ईमान के साथ और सवाब की नियत से इबादत के लिए खड़ा हुआ यानी नमाजे तरावीह और तहज्जुद पढ़ी, कुरआन की तिलावत की और अल्लाह का जिक्र किया तो उसके पिछले तमाम गुनाह माफ कर दिए जाते हैं।
नन्हें रोजेदार : इब्राहीम व साद ने रखा पहला रोजा
रोजा रखने में बड़ों के साथ बच्चे भी आगे हैं। तिवारीपुर निवासी मो. तालिब सिद्दीकी व आफरीन सिद्दीकी के आठ वर्षीय पुत्र मो. इब्राहीम सिद्दीका ने रमजान का पहला रोजा अपने घर के दीनी माहौल व अच्छे संस्कारों से प्रेरित होकर रखा। पहली कक्षा में पढ़ने वाले इब्राहीम ने पूरा दिन अल्लाह की इबादत की। घर वालों ने इफ्तार का खास इंतजाम किया। जिसमें रिश्तेदार वगैरह शामिल हुए। सबने तोहफा और ढ़ेर सारी दुआओं से नवाजा। इब्राहीम ने मगरिब के समय अल्लाह तआला का शुक्र अदा करते हुए खजूर के साथ रोजा खोला और दुआ मांगी।
वहीं जाहिदा बाद के रहने वाले मोहम्मद ईसा व फरहीन फातमा के आठ वर्षीय पुत्र मो. साद ने रमजान का पहला रोजा। यूकेजी में पढ़ने वाले साद ने अम्मी अब्बू के साथ सहरी खाई। दिन भर अब्बू के साथ अल्लाह की इबादत की। घर वालों ने हौसला बढ़ाया तो वक्त का पता नहीं चला। शाम को परिवार के साथ खजूर व लजीज पकवान से रोजा खोला। दुआ मांगी। घर वालों ने खूब सारी दुआ दी। खूब तोहफा मिला तो साद का चेहरा खिल गया।
पूरे मोहल्ले से कोई भी एतिकाफ में नहीं बैठा तो सब गुनहगार : उलमा किराम
रमजान हेल्पलाइन नंबर 8604887862, 9598348521, 9956971232, 7860799059 पर शुक्रवार को सवाल ओ जवाब का सिलसिला जारी रहा।
1. सवाल : अगर पूरे मोहल्ले से कोई भी एतिकाफ में नहीं बैठा तो क्या सब गुनहगार होंगे?
जवाब : हां। एतिकाफ करना सुन्नत अलल किफाया है अगर पूरे मोहल्ले से कोई भी एतिकाफ में नहीं बैठा तो सब गुनहगार होंगे।
2. सवाल : क्या दौराने एतिकाफ मोबाइल का इस्तेमाल किया जा सकता है?
जवाब : हां, जरूरत की बिना पर इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन मस्जिद के आदाब और दूसरे नमाजियों के हुकूक का ख्याल रखते हुए।
3. सवाल : क्या सगी खाला (मां की बहन) को जकात दे सकते हैं?
जवाब : अगर खाला जकात की मुस्तहिक है तो उन्हें जकात दे सकते हैं।
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