हजरत आयशा व शोहदा-ए-बद्र की याद में हुई फातिहा ख्वानी
सैय्यद फरहान अहमद
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।
मकतब इस्लामियात तुर्कमानपुर में फातिहा ख्वानी हुई। हजरत आयशा सिद्दीका रदियल्लाहु अन्हा व जंग-ए-बद्र के शहीदों को अकीदत का नजराना पेश किया गया।
मुख्य वक्ता कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी ने कहा कि उम्मुल मोमिनीन (मोमिनों की पाक मां) हजरत आयशा सिद्दीका पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बीवी व इस्लाम धर्म के पहले खलीफा हजरत अबू बक्र रदियल्लाहु अन्हु की बेटी हैं। आप बहुत विद्वान थीं। आप पैगंबर-ए-इस्लाम से बहुत सी हदीस रिवायत करने वाली हैं। आप इल्म का चमकता हुआ आफताब हैं। आप महिला सशक्तिकरण की सशक्त पहचान हैं। आप पूरी जिन्दगी महिलाओं के हक की अलम्बरदार रहीं। आपने 17 रमजानुल मुबारक को इस फानी दुनिया को अलविदा कहा। उन्होंने आगे कहा कि 17 रमजान 2 हिजरी को जंग-ए-बद्र हक और बातिल के बीच हुई। जिसमें 313 सहाबा किराम की मदद के लिए फरिश्ते जमीन पर उतरे।
विशिष्ट वक्ता शिक्षिका शिफा खातून ने कहा कि उम्मुल मोमिनीन हजरत आयशा तमाम मुसलमानों की पाक मां हैं। आपकी जिंदगी का हर पहलू दुनिया की तमाम महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है। तकवा परहेजगारी में आपका कोई सानी नहीं हैं। कुरआन-ए-पाक में आपकी पाकीजगी अल्लाह ने बयान की है। पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की निजी जिंदगी की तर्जुमान हजरत आयशा हैं।
मदीना मस्जिद रेती के इमाम मुफ्ती मेराज अहमद कादरी ने कहा कि इस्लामी इतिहास की सबसे पहली जंग मुसलमानों ने खुद के बचाव में लड़ी। जंग-ए-बद्र में मुसलमानों की तादाद 313 थी। वहीं बातिल कुव्वतों का लश्कर मुसलमानों से तीन गुना से ज्यादा था। जंग-ए-बद्र में कुल 14 सहाबा किराम शहीद हुए। इसके मुकाबले में दुश्मनाने इस्लाम के 70 आदमी मारे गए। कुरआन-ए-पाक में है कि "और यकीनन अल्लाह ने तुम लोगों की मदद फरमाई बद्र में, जबकि तुम लोग कमजोर और बे सर ओ सामान थे पस तुम लोग अल्लाह से डरते रहो ताकि तुम शुक्रगुजार हो जाओ"। जंग-ए-बद्र में मुसलमानों के पास लड़ने के लिए पूरे हथियार भी न थे। पूरे लश्कर के पास सिर्फ 70 ऊंट और दो घोड़े थे। जिन पर सहाबा किराम बारी-बारी सवारी करते थे। मुसलमानों का हौसला बुलंद था। अल्लाह के फज्ल से अजीम कामयाबी मिली। अंत में सलात ओ सलाम पढ़कर पूरी दुनिया में अमन ओ अमान की दुआ मांगी गई।
माह-ए-रमजान की रौनक चारों ओर
माह-ए-रमजान की रौनक बढ़ती ही चली जा रही है। मस्जिद व घरों में इबादत और कुरआन-ए-पाक की तिलावत हो रही है। दूसरा अशरा खत्म होने के करीब है। वहीं रमजान का तीसरा अशरा जहन्नम से आजादी का बहुत महत्वपूर्ण है। अंतिम दस दिन की पांच रात यानी 21, 23, 25, 27 व 29 रमजान की रात में से एक शबे कद्र की रात है। जिसमें इबादत का सवाब हजार महीनों की इबादत के सवाब से अफजल है। शबे कद्र में ही कुरआन-ए-पाक नाजिल हुआ। अंतिम दस दिन का एतिकाफ करना पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत है। बाजार पर ईद की खुशियों का रंग चढ़ गया है। वहीं अल कलम एसोसिएशन की ओर से सुब्हानिया मस्जिद तकिया कवलदह के बाहर 'किताबें बुला रहीं हैं' नाम से दीनी किताबों का स्टॉल लगाया गया। जिसमें मौलाना जहांगीर अहमद अजीजी, कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी, हाफिज रहमत अली निजामी, मुजफ्फर हसनैन रूमी, सैयद नदीम अहमद, आसिफ महमूद, हस्सान ने महती भूमिका निभाई।
© Copyright All rights reserved by India Khabar 2026