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संस्कार दिल और चरित्र को संवारता है - मुफ्ती अख्तर हुसैन

सैय्यद फरहान अहमद

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।

मकतब इस्लामियात फैजाने मुबारक खां शहीद की ओर से तुर्कमानपुर में सालाना जलसा आयोजित हुआ। कुरआन-ए-पाक मुकम्मल पढ़ने वाले उजैन, आतिफा खातून, माहिरा खातून, अफीना खातून, रयान व रेहान को पुरस्कृत किया गया। संचालन हाफिज अशरफ रजा इस्माईली व हाफिज सैफ अली इस्माईली ने किया।

मुख्य अतिथि संतकबीरनगर के शहर काजी मुफ्ती अख्तर हुसैन अलीमी ने कहा कि तालीम (शिक्षा) और तरबियत (संस्कार) एक बेहतर इंसान और सभ्य समाज के निर्माण के लिए अनिवार्य है। तालीम ज्ञान और स्वावलंबन देती है, जबकि तरबियत जीने का सलीका, नैतिकता और अदब सिखाती है। तालीम की कमी को तरबियत पूरा कर सकती है, लेकिन तरबियत की कमी तालीम से कभी पूरी नहीं हो सकती। सही और गलत की पहचान के लिए तालीम-ओ-तरबियत जरूरी है। तरबियत बच्चों को ईमानदार, विनम्र और अनुशासित बनाती है, जो जीवन की सफलता के लिए जरूरी है। बच्चे देश और कौम का भविष्य हैं, इसलिए बेहतर तालीम और अच्छी तरबियत से ही एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है। तालीम दिमाग को रोशन करती है और तरबियत किरदार को संवारती है। बिना तरबियत के तालीम अधूरी है और बिना तालीम के तरबियत के दायरे सीमित रह सकते हैं।

उन्होंने कहा कि किसी इंसान की असल पहचान उसके इल्म से नहीं, बल्कि उसके अदब और व्यवहार से होती है। तरबियत ही वह माध्यम है जिससे इंसान में दूसरों के प्रति सम्मान और नैतिकता का भाव पैदा होता है। जहां तालीम इंसान को दुनियावी और दीनी इल्म (ज्ञान) देती है, वहीं तरबियत उसे उस ज्ञान का सही इस्तेमाल करना और जीने का सलीका सिखाती है। सिर्फ तालीम इंसान को चालाक बना सकती है, लेकिन तरबियत उसे नेक इंसान बनाती है। बचपन से ही बच्चों की सही तरबियत करना माता-पिता की जिम्मेदारी है ताकि वे बड़े होकर अपनी पहचान, दीनी और नैतिक मूल्यों को बनाए रख सकें। 

जलसे में शहर काजी मुफ्ती मुहम्मद अजहर शम्सी, हाफिज रहमत अली निजामी, मुहम्मद अनस नक्शबंदी, उबैद रजा, कासिद रजा इस्माईली, मौलाना दानिश रजा, आजम रजा, सलीम अहमद, हाजी जलालुद्दीन कादरी, मुनव्वर अहमद सहित तमाम लोग मौजूद रहे।

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Jr. Seraj Ahmad Quraishi
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